मोहन राकेश//हिंदी साहित्य के प्रमुख नाटककार, कहानीकार//UGC//NET JRF//
आधुनिक हिंदी साहित्य कथ्य और नाट्य साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर हैं मोहन राकेश । मोहन राकेश बहुमुखी प्रतिभा के धनी कहलाए जाते हैं । इतना होने पर भी उन्होंने कहानी, नाटक और उपन्यास जैसी साहित्यिक विधाओं में मौलिक लेखन किया है। कथा साहित्य में उन्होंने कहानी,उपन्यास आदि यथार्थ के धरातल पर लिखा एवं उच्च कोटि का साहित्य है । उनकी रचनाशैली मानव मन में उभरने वाले आदर्श और यथार्थ के बीच के द्वंद्व की रही है ।
मोहन राकेश का जन्म 8 जनवरी सन् 1925 ई . को अमृतसर के एक कट्टर सनातनी परिवार में हुआ । इनका जीवन अन्तर्विरोधों से भरा रहा । इतना होने पर भी राकेश हमेशा प्रयोगधर्मी रहे,जिसकी गवाह उनकी समस्त साहित्य में की गई उनकी प्रयोगधर्मिता से दृष्टिगोचर होती है ।
मोहन राकेश हिंदी नवनाट्य
लेखन को एक व्यापक - सर्जनात्मक एवं ठोस आंदोलन के रूप में स्थापित करने का श्रेय
मोहन राकेश को है । सामान्यत : राकेश को प्रसाद की परंपरा का नाटककार कहा जा सकता
है क्योंकि उनके नाटकों में ऐतिहासिक नारी पात्रों की प्रधानता, भावुकता, काव्यात्मकता मौजूद है । फिर भी मोहन राकेश ने इस
परंपरा का नये रूप में विकास किया है एवं प्रसाद परपरा से इतर आधुनिक भाव बोध के
नाटक भी लिखे हैं । उन्होंने आधुनिक संवेदनाओं, आधुनिक मानव के द्वंद्व को पकड़ना चाहा है । उनके नाटकों
में पात्रों की भीड़भाड़ नहीं है । साथ ही उन्होंने नाटकों के चलते रूप को आधे अधूरे
नाटक में तोड़ा भी है । मोहन राकेश ने 'आषाढ़ का एक दिन', ' लहरों के राजहंस ' , ' आधे अधूरे ' , तथा ' पैरों तले की जमीन ' कुल चार नाटक लिखे । इसके अतिरिक्त, उन्होंने कुछ एकांकियों की भी रचना की ।
'आषाढ़ का एक दिन ' नाटक कवि कालिदास के सत्ता एवं सर्जनात्मकता के मध्य अंत :
संघर्ष का चित्रण करता है । यह केवल कालिदास का द्वंद्व नहीं बल्कि आधुनिक मानव का
भी अंतर्दृद्व है । कालिदास एक सृजनशील कलाकार के व्यवस्था द्वारा कुचल दिए जाने
का प्रतीक है ।
'लहरों के राजहंस' बुद्ध के भ्राता नंद पर आधारित नाटक है । इसमें भी भौतिकवाद
और अध्यात्मवाद का द्वंद्व है । इन दोनों किनारों के मध्य खड़े मनुष्य को उचित
समन्वय से ही सही दिशा मिल सकती है । इसमें ' सुंदरी ' प्रवृत्ति पक्ष का प्रतीक है तो ' बुद्ध ' निवृत्ति पक्ष के एवं नंद दोनों के बीच द्वंद्वग्रस्त मानव
चेतना का । प्रतीकों की बहुलता से कहीं - कहीं यह नाटक बोझिल प्रतीत होता है । लेकिन
चारित्रिक अंतर्द्वद्व , मनोवैज्ञानिकता के स्तर पर यह नाटक उल्लेखनीय बन पड़ा है ।
'आधे - अधूरे' में मोहन राकेश अभिजात्य संस्कारों मुक्त हो सीधे यथार्थ से
टकराते हैं । प्रश्न यहाँ भी द्वंद्व , असंतोष और एक अंतहीन खोज का है, केवल परिवेश भिन्न है । मध्यवर्गीय महानगरीय जीवन में
आर्थिक संकटों एवं अस्तित्व के संकट के कारण एक परिवार के विघटन को यह नाटक
रूपायित करता है । यह नाटक कई स्तरों पर संकेत देता है। पारिवारिक विघटन , मानवीय संबंधों में दरार , संबंधों की कटुता , आपसी रिश्तों की रिक्तता , यौन विकृतियों , द्वंद्व एवं नियति आदि को समेटता चलता है । ' आधे - अधूरे ' नाटक में उन्होंने एक ही अभिनेता से पाँच भूमिकाएँ कराने का
प्रयोग किया है लेकिन यह प्रयोग एक नाटकीय युक्ति बनकर ही रह गया । इसमें उन्होंने
'प्रस्तावना' का भी प्रयोग किया तथा परंपरा को नये संदर्भ में प्रयुक्त
किया । यह नाटक पहले के दो नाटकों से एक अन्य दृष्टि से भी भिन्न है । नंद एवं
कालिदास अंत में चले जाते हैं जबकि इसमें महेंद्रनाथ पुनः वापस लौट आता है जो
नाटककार की समसामयिक दृष्टि की प्रमाणिकता को सिद्ध करता है ।
' पैरों तले की जमीन ' में कोई कथानक नहीं है। स्थितियों की विसंगतियों से उत्पन्न
अंतर्द्वद्व की अभिव्यक्ति है । इसमें नेपथ्य की ध्वनियों के आधार पर रंगमंच को
नया अर्थ देने का प्रयोग है । इन चारों नाटकों के अतिरिक्त मोहन राकेश ने 'अंडे के छिलके ' , ' शायद ' , ' धारियाँ' नामक लघु नाटक भी लिखे हैं । इन सभी नाटकों में आधे -
अधूरे की भाषा सबसे जानदार बन पड़ी है जो आज के जीवन के तनाव को पकड़ पाती है
। यहाँ स्थितियों का चित्रण उतना नहीं है , जितना पात्रों की मन: स्थितियों का है। मोहन राकेश ने अपने
सभी नाटकों में भाव और स्थिति की गहराई में जाने का प्रयत्न अधिक किया है, शिल्प की बनावट का उतना नहीं । फिर भी उनकी कोशिश रही है कि
शब्दों के संयोजन से ही दृश्यत्व पैदा हो न कि यही उनके आंतरिक शिल्प की खोज है ।
उनके नाटकों में रंगमंच नाटक की बनावट में ही है, कहीं से अधिक आरोपित नहीं । मोहन राकेश के नाटकों में कथा
की उतनी चिंता नहीं की गई जितनी संवेदना को सही रूप में व्यक्त करने की । उन्होंने
हिंदी नाटक को प्रसादीय और कृत्रिम भाषा से मुक्त कर युगीन विसंगतियों को मूर्त
करने के लिए समर्थ भाषा प्रदान की । मोहन राकेश के नाटक रंगमंचीय दृष्टि से सफल
एवं प्रयोगशील नाटक हैं ।
कहानी, उपन्यास
और नाटकों के सर्जक मोहन राकेश का मोहन राकेश नयी कहानी के प्रवर्तकों में
से एक हैं । उनकी पहली कहानी 'दोराह' थी । उनके पाँच कहानी संग्रह हैं- ' इन्सान के खंडहर ', ' नये बादल ', ' जानवर और जानवर', “ एक और जिंदगी ', ' फौलाद का आकाश' ।
मोहन राकेश ने अपनी कहानियों के विषय में लिखा- "मेरी कहानियाँ
संबंधों की यंत्रणा को अपने अकेलेपन में झेलते लोगों की कहानियाँ हैं ।"
संबंधों की यंत्रणा मुख्यत : स्त्री - पुरुष संबंधों के टूटने - दरकने की है ।
मोहन राकेश ने व्यवस्था के खोखलेपन पर भी प्रहार किया है और विभाजन की त्रासदी
का चित्रण भी । 'मलबे का मालिक' में विभाजन का उन्माद ही है । मोहन राकेश की कहानियाँ त्रासद
तनाव की कहानियाँ हैं उनका सारा साहित्य अंतर्द्वद्व , तनाव से
भरा है । उनके पात्र प्रायः ऐसी स्थितियों में होते हैं जो उन्हें टूटने की हद तक
छोड़ जाते हैं। “ एक और जिंदगी ' में मनुष्य न छूटी हुई जिंदगी को छोड़ पाता है न चुनी हुई
जिंदगी को अपना पाता है । महानगरीय जीवन की यांत्रिकता और उसके दबाव से व्यक्ति के
अकेले पड़ते जाने की मानसिकता का चित्रण मोहन राकेश ने बड़ी सूक्ष्मता से किया है
। जिस “ प्रमाणिक हुए यथार्थ ' की बात नयी कहानी में की जाती है । वह सबसे अधिक मोहन राकेश
की कहानियों में देखा जा सकता है ।
मोहन राकेश की कहानी “परमात्मा का कुत्ता' व्यवस्था की विसंगतियों को चित्रित करने वाली कहानी है। 'मिसपॉल' कहानी बदलते - टूटते सामाजिक संबंधों को पूरी कलात्मकता के
साथ रेखांकित करती है । 'जंगला' कहानी में स्वातंत्र्योत्तर काल में बदलते मूल्यों से उपजा
अंतर्द्वद्व है । ‘ग्लासटैंक' कहानी स्वातंत्र्योत्तर काल में नारी जीवन की विसंगतियों को
रेखांकित करती है ।
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