हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श की अवधारणा
भारत वर्ष में मानव चिंतन ही रहा है । उसका निर्माण, विकास, दिशा निर्देश
आदि विभिन्न बातों में मनुष्य की चर्चा हुई । बाद में अनेक कारण आते गए और यह
कालक्रम में उग्र भी हुआ । इसमें असमता का भी प्रादुर्भाव हुआ । इस प्रकार समाज
में ही स्थिति विषम हो गई । नारी के प्रति पूरा दृष्टिकोण एक समय नकारात्मक हो गया
। पूरा समाज तो कभी भी दो भागों में नहीं बटा, पर चिंतन
दिखने लगा । यहाँ तक कि विभिन्न सभ्यताओं में भी नारी के प्रति दृष्टि विभिन्न हो
गई । आगे चल कर इसी आधार पर नारी चिंतन भी भिन्न रूप लेकर हमारे सामने आता है ।
इसमें सबसे बड़ा हाथ स्त्री के प्रति दृष्टिकोण का है । भारतीय दृष्टि में नारी एक
मूल्य है । पर पाश्चात्य जगत में नारी एक बस्तु है । हमारे मूल्याधारित चिंतन
दोनों को एक तराजू पर नहीं रख सकते । फिर भी नारी वर्ग ऐसा वर्ग है जो नस्ल ,
राष्ट्र आदि संकुचित सीमाओं के पार जाता है । जहाँ कहीं दमन है ,
जिस नस्ल की स्त्री त्रस्त है , यह उसे अपने
परचम के नीचे लेता है । आज नारियों का स्थानीय मंडल राष्ट्रीय समूह ही नहीं
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गुट बन कर उनकी समस्या निराकरण की समस्या की चर्चा हो रही
है । वह अपने समान अधिकारों की मांग बुलन्द कर रही है । इसे बड़ी उपलब्धि मानना
होगा ।
भारतीय जीवन में शुरू से अब तक नारी के प्रति दृष्टि का सच्चा लेखा जोखा
उपन्यास, कहानी या कविता में मिलता है, इसकी लंबी
परंपरा है । हजारों साल पहले जब हमने लिपि का आविष्कार भी नहीं किया था । तब जो रचा
जाता वह मौखिक होता । हम उसे मौखिक ही दूसरों तक पहुँचा देते । फिर दूसरी पीढ़ी को
यो पीढ़ी दर पीढ़ी परंपरा चलती गई । उन दिनों नारी पुरुष का शारीरिक भेद तो मानते
थे, परंतु और किसी प्रकार का अंतर नहीं । समाज में नारी
पुरुष का समान भाव ही हम सदियों तक स्वस्थ समाज बने रहने में सहायक रहा । परंतु
बाद में माइग्रेसन का प्रभाव बहुत गहरा हुआ । समाज में दूर दूर जा बसने के बाद
ऐक्य तो सपना बन गया । परंपरा में जो मूल्य हमने स्वयं बनाये वे क्रमश: बिखरते गए
। वह विघटन हमारे समाज को दुर्बल करता गया । इस प्रकार इतिहास के थपेड़ों से उतार चढ़ाव
आता गया । हमारी पारंपरिक समाज व्यवस्था में भी क्रमशः परिवर्तन आता गया । कुछ
मूल्य टूटे , कुछ सुधरे और कुछ स्थायी बन कर आज भी चमक रहे
हैं ।
'स्त्री विमर्श ' की परिभाषा: 'नारी विमर्श ' यह
शब्द पाश्चिम में " Feminism " का हिंदी पर्याय है
। परंतु पश्चिम और पूर्व में नारी को लेकर भिन्न दृष्टि है । वहाँ नारी किसी
परंपरा को नहीं तोड़, वर्तमान से ही विद्रोह कर रही है । भारत
में हजारों वर्ष की रूढ़ियों, परंपरा और प्रचलन को तोड़ नया
कुछ करने की बात करती है मानो वह नारी अपनी अस्मिता का बोध लेकर अपनी मुक्ति की
तरफ बढ़ रही है ।
आज नारीवाद में परिवार और विवाह पर प्रश्न चिन्ह लगाया है । उसे स्त्री दासता
का चिन्ह कहा । नारीवाद में परिवार को जेल रचना कहा । हालांकि पहले पुरुष को
दुश्मन कहा , आज स्त्रीवाद की
दृष्टि से उपभोक्ता संस्कृति पर फल फूल रही व्यवस्था है जो स्त्री पुरुष दोनों को
समान रूप से गुलाम बना रही है ।आज उसमें यह बोध जाग उठा है कि वह स्वयं भी पुरुष
के समकक्ष एक इकाई है । अत: किसी रूप में गुलाम या अधीनस्थ नहीं । पुरुष उस पर
वर्चस्व न जमाये । अत: वह चाहती है कि सभ्यता का अर्थ है मनुष्य पशु प्रवृत्ति पर
विजय प्राप्त करे । स्त्री - पुरुष के बीच कोई पाशविक संपर्क नहीं रहना चाहिए । वह
दोनों साथी बन कर रहें । यही मूल भावना है । इस प्रकार स्त्री विमर्श एक प्रकार की
चिंतन धारा है ।
नारी एक जीवंत सत्ता स्वीकार होती है । इस प्रकार औरत अपने को व्यक्ति समझने
लगती है । अंतर्मन में यह चेतना जाग्रत करना ही नारी विमर्श या स्त्री विमर्श है ।
स्त्री विमर्श में औरत की चर्चा वस्तु रूप से हट कर व्यक्ति रूप में की जाती है ।
समाज में उसकी स्वतंत्र सत्ता का युगों से हनन हुआ है । इसके कारणों की चर्चा है ।
इसके संबंध में आज की स्थिति की चर्चा है। समाज में स्त्री का स्थान क्या है ?
स्त्री पुरुष संबंधों और उनके अतीत तथा वर्तमान पर विवेचन विश्लेषण है ।
भारतीय परंपरा की रूढ़ियों और कुछ ग्रंथियों पर प्रकाश डालना है । स्वस्थ एवं
गतिशील समाज के लिए स्त्री की भूमिका और दृष्टिकोण पर भी विचार होता है । कैसे
उसकी रक्षा संभव है । इसमें उसके अधिकार और सामाजिक दायित्व दोनों पर संतुलित
दृष्टि से चर्चा होनी है । त स्त्री विमर्श होता है । 1949 में सीमोन द बेउवौर
ने The second sex में नारी विमर्श पर पहली बार कटुतम शब्दों
में लिखा । नारी को वस्तु रूप में प्रस्तुत करने पर टिप्पणी की । बाद में '
Modern women ' में डोरोथी पार्कर ने इस
बात की आलोचना की कि नारी को नारी रूप में देखा जाय । वह कहती है नारी पुरुष सब
मानव प्राणी रूप में स्वीकार हैं । यह द्वैत मान्यता पराधीनता और सापेक्षता को
जन्म देती है ।
1960 ई. में केटमिलेट ने रूढ़िवाद पर कहा - "पुरुष स्त्रियों की समस्या पर सोचना ही नहीं चाहता स्त्रियों को अपनी खामोशी तोड़नी होगी । युगों से हो रहे अत्याचारों पर दुनिया को बताना होगा । सत्तर के दशक में बेट्टी फ्रिडन ने कहा गृहणी यानी घरेलू औरत समाज में पराजीवी है । वह अर्धमानव की कतार में है । इसी को विश्लेषण कर गिलीमन ने 1993 ई. में ' In a Different voice' से कहा- बचपन में सशक्त दिखती लड़की औरत होने पर कमजोर क्यों दिखती है ? आत्मविश्वास ढह जाता है। वह बड़ी होकर पत्थर की मूरत बन जाती है । अब 20 वीं सदी सूचना क्रांति लायी । संचार क्रांति में जनमानस को नियंत्रण में लाने का प्रयास है । व्यक्तिगत स्तर पर संवेदना शून्य किया जाए । मानव अस्तित्व के सामने यह एक संकट है ।
भारत में नारी विषयक चिंतन का इतिहास बहुत पुराना है । प्राचीन काल में यहाँ
नारी को सम्मान दिया जाता था । क्योंकि उसके बिना कोई राजकार्य, धर्म कार्य, दान-दक्षिणादि
संभव नहीं होता । उसी प्रकार नारी को समाज में हर क्षेत्र में पूरा अधिकार एवं दायित्व
था । वह वेदाध्ययन ही नहीं, वेदों की ऋचाओं की स्रष्टा रही
है । यज्ञादि उसके बिना संपन्न नहीं हो सकते थे । उसी प्रकार जो भी पुरुष संकल्प
करता नारी बिना संभव न था । वह संन्यास या अन्य आश्रम में जाता, स्त्री से अनुमति जरूरी थी । शुरू से उसमें लिंगाधारित कोई समस्या ही न थी
। कोई शोषण न था । धीरे धीरे बाह्य संस्पर्श में आता गया । मनुष्य का भिन्न
संस्कृति से संबंध होना और फैलाव के कारण विभिन्न समस्यायें पैदा हुई।
भारत में युगों से स्त्री संबंधी विमर्श शास्त्रीय आधार की तरह लोकतात्विक
आधार पर भी स्पष्ट लोक मानस में दो तरह की स्त्री - 1. सुखिया । 2. दुखिया । दो बहन , दो पत्नी , ननद -भाभी , सास -
बहू , दो सहेली बन कर अक्सर व्यक्त होती हैं । यहाँ मां बेटी का रिश्ता ऐसा है जहाँ विलोम नहीं होता ।
एक सुखी -दूसरी दुःखी ऐसा नहीं संभव । एक के सुख में दूसरी का सुख है । एक दुःखी
तो दूसरी दुःखी है ।
हिन्दी कथा साहित्य में नारी: राजनीतिक -सामाजिक स्तर पर नारी अस्मिता की
स्थापना और गरिमा के लिए काफी प्रयास हुए । नारी का सुखद भविष्य उसे न्याय समानता
और स्वतंत्रता प्रदान बिना संभव नहीं । परंपरागत नारियों का बंधन तोड़ना जरूरी था
। इसमें मुख्य मुद्दे थे - पुरुष -स्त्री समानता , शिक्षा , विवाह , नौकरी
, हर क्षेत्र में राजनैतिक , व्यवसायआदि
में दोनों लिंगों को समान अधिकार हो । आजादी के बाद संविधान में समान अधिकार दिया
। जनतंत्र में वोट का समान अधिकार मिला पर व्यावहारिक रूप में बहुत कुछ छूट गया ।
शोषण चला , दहेज उत्पीड़न , वेतन का
तारतम्य रहा । पर नारी इसमें उठ खड़ी हुई । रामायण -महाभारत में नारी के साथ जो
हुआ वह अकल्पनीय है । विलास की साधन बनी । उसे अबला कहा गया । सतीत्व की परीक्षा और
सती -असती के मानदंड पुरुष -स्वी समाज में भिन्न भिन्न हुए । इस तरह नारी समाज में
हाशिये पर आ गई ।
हिंदी साहित्य में वीरगाथा युग में वह इज्जत और प्रतिष्ठा का प्रतीक बनी । अत:
उस पर बंदिश लगी सती, बहु
विवाह, अंध विश्वास आदि कुरीतियाँ नारी जीवन को संकट में ले
गयी । सबसे बड़ा संकट था सती प्रथा का । नारी को पति के साथ चिता पर बैठा दिया
जाता । पति नहीं तोखी भी नहीं । इस दकियानुसी प्रथा का खंडन किया राजामोहन राय ने।
फिर भी यह प्रथा आज भी चोरीछिपे चल रही है । हमारा समाज इसे धर्म का नाम दे देता
है । लेकिन भक्तिकाल में अवहेलना भी झेली । उसको द्वितीय दर्जे का इंसान कहा । जब
कि रीतिकाल में आकर नारी मांसलता प्रमुख हो गई । भोग्यता रूप ही ज्यादा चित्रित
हुआ । दरबारी और सामंती युग में नारी की महिला उसके सौन्दर्य , उसकी मांसलता अथवा कला रूप पर निर्भर करने लगी । परंतु आधुनिक युग में
परिवर्तन होता है । सती प्रथा का अंत, विधवा विवाह, बाल विवाह पर प्रतिबंध , शिक्षा का प्रचलन आदि
क्रमबारी सुधार चले । नारी की स्थिति जबरदस्त सुधार आया ।
भारतेंदु हरिश्चन्द्र के साहित्य में नारी के बदले रूप की तस्वीर उभर कर आने
लगी । 20 वीं सदी के प्रारंभ में गांधीजी ने सुधार की आवाज उठायी । वह मुख्यधारा
में जुड़ती है । स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया । महिला रचनाकारों ने इसे अनदेखा
नहीं किया । प्रेमचन्द ने नारी शोषण का विरोध किया । नारी का सबल रूप चित्रित हुआ
। कुछ ही समय में जैनेन्द्र ने परंपरागत नारी की मूर्ति का भंजन किया ।
1947 के बाद नारी घर से निकली । स्कूल , कालेज , बजार , दफ्तर गई ।
सामाजिक स्थिति बदली पर नई समस्यायें आयी । घर बाहर दोनों जगह पुरुष वर्चस्व के
खिलाफ खड़ी हुई । फिर भी हार नहीं मानतीं । संघर्ष और साहस से बदले परिवेश को
स्थापित किया । इस नई कहानी की पात्र पुराने मूल्यों , जंजीर
, रूढ़ियों , आधुनिक सभ्यता के तथाकथित
अधिकारों में बदलते संदर्भ में नारी की स्थिति उभरी । इनमें कमलेश्वर , राजेन्द्र यादव , मन्नु भंडारी , प्रभाखेतान , उषा प्रियम्बदा , मैत्रेयी पुष्पा को महत्व दे सकते हैं । बीसवीं सदी के छठे दशक के शेष में
विद्रोह और तीखा होता है । संयुक्त परिवार प्रथा के विभिन्न पक्षों पर सवाल उठाये
गये । राजेन्द्र यादव से नारी चेतना के संकेत रूप दिये । संयुक्त परिवार कुचलना
चाहता है, पर संभव नहीं होता । अब वह ' माँ ' तक की पत्नीत्व की उपेक्षा करती है ।
मन्नू जी कहती हैं - आज की ' मैं
' इतनी निर्बल और निरीह नहीं कि मुझे जीवन बिताने के लिए कोई
सहारा चाहिए । " इस युग में वह अपनी ताकत पहचान रही है । विवाह संस्था की
मोहताज नहीं रह जाती । कामकाजी महिला घर का दायित्व लेकर भरण पोषण करती है । पर वह
जो चाहती है वह भी करने की इच्छुक है । कमलेश्वर ने नगरीय परिवेश की पर लिखी नारी
की विद्रूप , विसंगतियों और समस्याओं पर प्रकाश डाला ।
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