Thursday, 27 May 2021

पचपन खंभे लाल दीवारें और नारी विमर्श:

 

 

उषा प्रियंवदा की गणना हिन्दी के उन कथाकारों में होती है जिन्होंने आधुनिक जीवन की ऊब, छटपटाहट, संत्रास और अकेलेपन की स्थिति को अनुभूति के स्तर पर पहचाना और व्यक्त किया है । यही कारण है कि उनकी रचनाओं में एक ओर आधुनिकता का प्रबल स्वर मिलता है तो दूसरी ओर उसमें विचित्र प्रसंगों तथा संवेदनाओं के साथ हर वर्ग का पाठक तादात्म्य का अनुभव करता है ; यहाँ तक कि पुराने संस्कारवाले पाठकों को भी किसी तरह के अटपटेपन का एहसास नहीं होता ।

'पचपन खंभे लाल दीवार' ऊषा प्रियंवदा जी का पहला उपन्यास है । नारी विमर्श को लेकर रचा गया यह एक महत्वपूर्ण उपन्यास है । इस उपन्यास के कथानक में स्त्री की देह, उसका मन, उसके परिवार और सामाजिक रिश्तों सबमें लेखिका ने नारी की स्थिति पर प्रकाश डाला है । विविध प्रसंगों में सुषमा के कार्य, उसकी गति विधि, नारी का अंतर वाह्य केवल एक भोग्य वस्तु रूप में ही नहीं है । समाज का उसके प्रति दृष्टिकोण और उस पर नारी की संवेदनशील प्रतिक्रिया व्यक्त हुई है । सुषमा का बाहरी रंग, रूप, सौन्दर्य, अंग यष्टि से अधिक प्रभावशाली उसका चिंतन, उसकी प्रतिक्रिया, उसका अंतर्द्वद है । सुषमा चौराहे पर है । अत : विचलित है । यह उपन्यास स्वातंत्र्योत्तर भारत में पढ़ी लिखी कामकाजी महिला पर पड़े बंधों पर प्रकाश डालता है । नारी परिवार के प्रति समर्पित होकर अपना व्यक्तिगत सुख दुःख भूल जाती है । जरा सा सुख देखने किसी से मिल जुल लेती है तो हजार आँखें उसपर चौकसी करती हैं । उसे बदनाम करती हैं, व्यंग्य करती हैं । यहाँ पर स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु बन जाती है । वह ईर्ष्या , द्वेष , जलन षडयंत्र आदि क्या -क्या नहीं कर सकती । यहाँ तक कि सुषमा के लिए सामान्य जीवन जीना कठिन हो जाता है । नौकरी करने में अड़चन आती है । आखिर उसे पीछे हटना पड़ता है । सारे अंतर्द्वद्व , सारी पीड़ा और घुटन को समेट कर वह नील से पीछे हटती है या उसे धक्का देती है । इस उपन्यास में परिवर्तन के दौर से गुज रहे समाज में संघर्ष करती नारी की पीड़ा वर्णित हुई है ।

अंधविश्वास, रूढ़ियों और कुसंस्कारों से छूट रहे समाज में नारी के कदम किस प्रकार बढ़ते हैं; लड़खड़ाते हैं । वह टूटती है, परंतु कहीं झुकती नहीं । छोटे मोटे लोभ में अपना अस्तित्व नीचे नहीं गिराती, संभलती है । अपना व्यक्ति का स्वार्थ बलि कर फिर टिकी रहती है । यहीं उसका दृढ़ चरित्र सामने आ रहा है । नारी अंतर्द्वद्व इस उपन्यास के प्राण हैं । सुषमा केवल आदि , कल्पना और हवाई नारी नहीं है । वह भी हाड़ मांस की बनी औरत है । उसकी मानवीय इच्छा आकांक्षा है । शारीरिक जरूरत है । चोट लगने पर पीड़ा होती है । प्रिंस ( नील ) आने पर या रेस्तोरा में कॉफी पीते समय खुशी होती है । विविध भावों से पूर्ण वह एक संवेदना भरी पूर्ण स्वी है ।

आधी अधूरी अथवा अतिरेक से भरी फूहड़ता कहीं नहीं । उषाजी ने इस नारी में अपने पद के प्रति मर्यादा भाव जीवित रखा है । परिवार के प्रति दायित्व रखा । समाज के व्यंग्य -विनोद के प्रति भी संवेदनापूर्ण रखा है । सुषमा का जीवन बंद कमरे में घुट घुट कर नहीं कटता । समस्याओं से लड़ती है । पढ़ाई कर प्राइवेट नौकरी कर रही है । परंतु अनैतिक आकांक्षा देखते ही वह नौकरी छोड़ देती है । नई जगह चली आती है । हास्टल वार्डन के रूप में पूरी ईमानदारी से कर्तव्य निभाती है । हास्टल में व्यवस्था लाती है । अनुशासन हुआ । लेकिन नील के आने के बाद आया परिवर्तन उसकी अपनी उदासी दूर करता है । पर इसे सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती । अब जग कुतर्क देकर उसे अफावाहों के घेरे में डाल देते हैं । वह फिर एक बार बेदाग तन कर खड़ी हो जाती है । पूरी दृढ़ता से क्लास में पढ़ाती है । हास्टल से हटाने के सारे षडयंत्र बह खत्म कर देती है । यहाँ सुषमा का दृढ़ चरित्र और स्वभाव की स्पष्टता परिलक्षित होती है । इस प्रकार नारी नये क्षेत्र ( नौकरी ) में आकर जिन समस्याओं का सामना करती है , उषाजी ने खूब सूक्ष्मता पूर्वक उसका संवेदनपूर्ण चित्रण किया है । वास्तव में नारी तन और मन दोनों का विश्लेषण और विवेचन इस उपन्यास की बड़ी विशेषता है । इसमें आदर्श और यथार्थ दोनों को सुषमा के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है । इसमें भारतीय नारी विमर्श की सुदृढ़ आधारशिला रखी गई है ।

पचपन खंभे लाल दीवारें ऊषा प्रियंवदा का पहला उपन्यास है, जिसमें एक भारतीय नारी की सामाजिक आर्थिक विवशताओं से जन्मी मानसिक यंत्रणा का बड़ा ही मार्मिक चित्रण हुआ है । छात्रावास के पचपन खंभे और लाल दीवारें उन परिस्थितियों के प्रतीक हैं जिनमें रहकर सुषमा को ऊब तथा घुटन का तीखा एहसास होता है, लेकिन फिर भी वह उससे मुक्त नहीं हो पाती, शायद होना नहीं चाहती, उन परिस्थितियों के बीच जीना ही उसकी नियति है । आधुनिक जीवन की यह एक बड़ी विडंबना है कि जो हम नहीं चाहते वही करने को विवश हैं । लेखिका ने इस स्थिति को बड़े ही कलात्मक ढंग से प्रस्तुत उपन्यास में चित्रित किया है । एक सुषमा को लगा कि नील आकर सिरहाने खड़ा हो गया है, फिर उसने झुककर, धीरे से उसके बाल छुए हैं । सुषमा चौंककर उठ बैठी , चारों ओर घुप्प अँधेरा था...।

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