UGC NET JRF//HINDI SHAHITYA//अस्तित्त्ववाद ( Existentiation )
अस्तित्त्ववाद
जर्मन भाषा के एग्जिस्टेन्ज फिलासाफी के अनुवाद हेतु प्रयोग में लाया गया शब्द था
। एग्जिस्टेन्ज शब्द प्रथम महायुद्ध के पश्चात् दार्शनिक शब्दावली का अंग बन गया ।
साधारण भाषा में इसका अर्थ है- “जो भी है- पशु, पक्षी, वस्तु सभी का
अस्तित्त्व है",
किन्तु अस्तित्त्ववादी भाषा में अस्तित्त्व का सम्बन्ध केवल
मानव के अस्तित्त्व '
से है ।
डॉ. पुष्पा
बंसल के अनुसार- "अस्तित्त्ववाद एक तर्कसंगत दार्शनिक मतवाद की अपेक्षा
एक दार्शनिक के दृप्टिकोण का प्रतीक है ।" ( पाश्चात्य काव्यशास्त्र : द ष्टि
एवं दर्शन ,
प 0206 )
अस्तित्ववादियों
का कथन है कि मानव अपनी समस्त स्थितियों के लिए स्वयं उत्तरदायी है । वह अपनी
परिस्थितियों का ;
परिवेशगत सफलताओं , असफलताओं का स्वयं निर्माता एवं
निर्णायक है। वह निर्णय करने के लिए स्वतन्त्र है ।
अस्तित्त्ववाद
अपने वर्तमान अर्थ में उन्नीसर्वी सदी के मध्य की उपज है । इसकी पृष्ठभूमि में
औद्योगिक क्रांतिजनित वह भौतिकता थी जो मनुष्य अस्तित्त्व की अवहेलना कर उसे
निर्मूल्य कर रही थी । मनुष्य अस्तित्त्व के इस अवहेलनात्मक सामाजिक द ष्टिकोण की
प्रतिक्रियास्वरूप कुछ चिन्तकों ने परम्परागत सामाजिक एवं धार्मिक मूल्य -
मान्यताओं को निष्प्राण घोषित विशुद्ध मानव मूल्यों की स्थापना का प्रयास किया ।
इन चिन्तकों
में जर्मनी के फ्रेडरिख नीत्से , कार्ल जेस्पर्स , मार्टिन हेडगर , फ्रांस के
ग्रेब्रियल मार्शल ,
ज्यों पाल सात्र , अल्बर्ट कामू आदि के नाम उल्लेखनीय हैं
। डेनमार्क के सारेन किर्केगार्ड इस दार्शनिक प्रव ति के प्रवर्तक हैं ।
अस्तित्त्ववादी विचारकों में सर्वाधिक महत्त्व सार्च को दिया जाता है । साहित्य के
क्षेत्र में इस दार्शनिक द ष्टिकोण को व्यापकत्व प्रदान करने वाले प्रथम दार्शनिक साहित्यकार
सात्र ही हैं । अतः साहित्य में अस्तित्त्ववादी चिन्तन का प्रारम्भ सार्च से ही
होता है जिसका अनुसरण वाद में बहुत से लेखकों ने किया ।
अस्तित्त्ववाद
का स्वरूप- अस्तित्त्ववाद के अनुसार 'अस्तित्त्व' महत्त्वपूर्ण
है । फलतः सभी अस्तित्त्ववादी परम्परागत सिद्धान्तों के विरोधी हैं ।अस्तित्त्व के
दो रूप हैं- धार्मिक और कला सम्बन्धी । धार्मिक को प्राथमिकता देने वाले
दार्शनिकों का मत है कि मानवीय संघर्ष की क्रियाशीलता धार्मिक क्षेत्र में होनी
चाहिए जो ईश्वर - प्राप्ति का माध्यम बन सके । दर्शन वस्तुतः इसी आधार पर विज्ञान
से श्रेष्ठ होता है कि विज्ञान केवल वस्तु जगत का अध्ययन करता है , अस्तित्त्ववादी
अनुभवों में वे रहस्य छिपे रहते हैं जिनसे मानव जूझता है और विश्वास श्रद्धा का
आधार स्वयं ही बनता है । इन आन्तरिक आत्मिक अनुभवों को विज्ञान स्पर्श नहीं करता ।
जर्मन
अस्तित्त्ववादी कार्ल जेस्पर्स का मत है कि जगत् का कोई भी तर्कपूर्ण चित्र
प्रस्तुत नहीं किया जा सकता और बुद्धिवादियों का इस दिशा में कोई भी प्रयास व्यर्थ
है , क्योंकि यह
बहुत सम्भव है कि अस्तित्त्व के लिए वह मूर्ति ' शून्य '
ही हो जिसकी व्याख्या आवश्यक है । जगत् म गत ष्णा नहीं है .
माया नहीं है । अस्तित्त्व का वास्तविक अर्थ जेस्पर्स की द ष्टि में , किसी मानव को
किसी हठात् आघात (Snock)
के माध्यम से ही ज्ञात हो सकता है । इस ज्ञान को आघात के
माध्यम से प्राप्त करके ही मानव अपने दैनिक जीवन की दुश्चिन्ताओं से मुक्त हो सकता
है ।
अस्तित्त्ववाद
के कला सम्बन्धी रूप में स्थापक एवं पोषक है- हेडेगर , कामू और सार्च
। अस्तित्त्ववा '
वैयक्तिक आदर्शवादी कला प्रतिपादन ज्यों पाल सार्च ने ' अस्तित्त्व एवं
मानव - स्वातन्त्र्य '
में किया था । अलबर्ट कामू ने भी इस सिद्धान्त का विवेचन
किया । इस सिद्धान्त के अनुसार कलाभिव्यंजना का उद्देश्य ' अस्तित्त्व
सम्बन्धी विकीरण '
( ( Existential illumination ) है जिसका तात्पर्य है कि कला का
उद्देश्य अतर्कवादी वैयक्तिक अनुभवों एवं द ष्टिबोध का विकीरण करना है । साहित्य
का उद्देश्य परोक्ष भावानुभूतियों का चित्रण करना होता है । आस्ट्रिया के प्रसिद्ध
कवि रिल्के के सोनेट एवं शोक गीतों में इस प्रकार का चित्रण कुशलतापूर्वक किया गया
है।
अस्तित्त्ववादी
पारम्परिक आस्थाओं ,
जीवन - विश्वासों , धारणाओं , नीति - नियमों
के कट्टर शत्रु हैं ,
जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखने के कारण समाज में
प्रचलित हैं तथा व्यक्ति स्वच्छन्दता में बाधक है ।
अस्तित्त्ववादी
विचारक ज्ञान - विज्ञान ( इतिहास , समाजशास्त्र , दर्शन , मनोविज्ञान आदि
) को भी महत्त्वहीन मानते हैं । उनके लिए वह सब कुछ व्यर्थ है जिससे अस्तित्त्वबोध
में सहायता नहीं मिलता। वे मात्र मानव - स्थिति ( Human condition ) जानने के
आग्रही है ,
क्योंकि उससे अस्तित्त्व बोध में सहायता मिलती है ।
अस्तित्ववादी पूर्ण स्वच्छन्दता में जीकर अन्त में म त्यु को ' अस्तित्त्व ' का अनिवार्य
अंश मानकर उसका साहसपूर्वक वरण करना चाहते हैं । सात्र ने लिखा है " मत्यु
नहीं आती है ,
जब तक ' मैं हूँ , मत्यु के आने
के बाद मैं हूँ ही नहीं इसलिए बाधा कैसी ? जन्म की भांति मत्यु भी एक शुद्ध तथ्य
है । " ( पाश्चात्य साहित्यशास्त्र की भूमिका , प 0232 )
प्रत्येक
क्षेत्र में अस्तित्त्ववादियों के लिए स्वच्छन्दता ही जीवन दर्शन का मूलाधार है और
उनके मूल्यहीन साहित्य दर्शन का एकमात्र मूल्य । चयन की स्वच्छन्दता अथवा वैयक्तिक
स्वच्छन्दता ही चूँकि अस्तित्त्ववादी दर्शन का प्राणतत्त्व है , इसलिए उनके
साहित्य में घोर अराजकता ,
उन्मुक्त भोग, यौनवादिता , नास्तिकता , असामाजिकता , विज्ञान
विरोधिता आदि अनेक अनाचारी एवं अवांछनीय तत्वों की बहुलता पाई जाती है । (
पाश्चात्य समीक्षा : सिद्धान्त और वाद , प . 310 )
अस्तित्त्ववाद
की विशेषताएँ-
अस्तित्त्ववादी
दर्शन के अनेक विचारकों के अनुरूप उसके अनेक रूप पाए जाते हैं । फिर भी उसकी कुछ
सामान्य विशेषताएँ जिनका उल्लेख किया जा सकता है । अस्तित्ववादी जीवन दृष्टि में
मनुष्य की समस्या ही सर्वोपरि है । ठोस अस्तित्व, व्यक्तिगत
स्वच्छन्दता तथा अपने क्रिया कलापों के निर्माण एवं उत्तरदायित्व का स्वतन्त्र
अनुभव ही ये स्तम्भ हैं जिन पर अस्तित्त्ववादी जीवन - दर्शन का महल खड़ा है । साहित्य
के क्षेत्र में यह जीवन दृष्टि पूर्णतः व्यक्तिवादी, आत्मकेन्द्रित, अन्तःमुखी और
आत्मनिष्ठ विचारधारा है । इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
(क) जीवन की
निरर्थकता का अनुभव ( Absurdity
of human life ) - कामू मानव की अभिलाषाओं एवं आशाओं का इस
निरर्थक संसार से अनवरत संघर्ष मानते हैं , क्योंकि उनका प्रतिफलन असम्भव है , अतः संसार के
सभी व्यापार अकारथ हैं । मानव का जीवन एक निरर्थक प्रयास है , जैसे- सिसिपस
का पत्थर पहाड़ पर चढ़ाने का प्रयास और फिर नीचे गिर पड़ने का क्रम । आधुनिक
सभ्यता में मानव जीवन भी इसी प्रकार व्यर्थ एवं अकारथ हैं । अस्तित्त्ववादी काम के
इसी अनर्गलता बोध से प्रभावित निराशावादिता , पीड़ा . एकाकीपन एवं वैयक्तिक स्वच्छन्दता
की ओर अग्रसर है ।
(ख) मानव
स्थिति ( Human
condition ) को दुःखद और पीड़ाजनक मानना अस्तित्ववादी मानव- स्थिति को
पूर्णतः दुःखद मानते हैं । इस दृष्टि से वे घोर निराशावादी हैं । पीड़ा, संत्रास, दुःख, यातना, एकाकीपन अथवा
आत्मनिर्वासन से युक्त जीवन जीना मनुष्य की अनिवार्य स्थिति है । वे मानक स्थिति
की सीमा निर्धारण करते हुए मृत्यु को उसकी सीमा मानते हैं।
( ग ) वैयक्तिक
स्वच्छन्दता पर बल - अस्तित्ववादी सभी प्रकार के परम्परित जीवन मूल्यों के प्रति
विद्रोह करना सच्ची वैयक्तिक स्वच्छन्दता मानते हैं । उनके अनुसार जीवन की
निरर्थकता के प्रति विद्रोह करने वाले ही सच्चे अर्थों में मुक्त हैं और जिन्हें
इस निरर्थकता का बोध हो गया है , ये जीवन के प्रति सही अर्थ में विद्रोही
हैं । इस विद्रोह का अभिप्राय है- जीवन के परम्परागत मान मूल्यों के प्रति, समाज , धर्म , नीति आदि से
सम्बन्धित धारणाओं एवं विचारों के प्रति विद्रोह ।
( घ) मत्यु बोध
- अस्तित्त्ववादी म त्यु को मानवीय स्थिति की सीमा मानते हैं । उनकी न दिन से मृत्यु
की उपयोगिता है । वह जीवन का शुद्ध तथ्य है , क्योंकि म त्यु से निरासक्ति का । भाव
पैदा होता है तथा अपने अस्तित्त्व का सही ज्ञान भी । भौतिक सभ्यता में अपने आपको जानने तथा
अस्तित्त्व बोध के लिए मत्यु जैसे धक्के की आवश्यकता है । मत्यु - बोध को
अस्तित्त्व बोध कराने में महत्त्वपूर्ण अनुभव है ।
जैसे टॉलस्टाय
की कहानी '
ईवान इलिच की मत्यु ' का प्रसंग , जिसमें
अतिसम्पन्न पूर्णतः प्रतिष्ठित और अपने जीवन में अति सफल व्यक्ति ईवान इलिच को
अचानक सीढ़ियों से गिरकर मरते हुए जीवन के प्रति मोह पैदा होता है । इलिच के शब्द
" काश ! मैं जीवन फिर से प्रारम्भ करता " इस बात के द्योतक हैं कि आज की
सभ्यता ने मनुष्य को अकेला कर दिया है, वह अपना आपा खो चुका है ।
हिन्दी की नई
कविता में अस्तित्त्ववादी लहर व्याप्त है । धर्मवीर भारती , भारत भूषण
अग्रवाल ,
दुष्यन्त कुमार , कुंवर नारायण , अज्ञेय आदि
कवियों में अनास्था ,
अस्तित्त्व बोध , मृत्युबोध , वैयक्तिक
स्वच्छन्दता ,
निराशा , पीड़ा , उन्मुक्त भोग
आदि प्रव त्तियों की अनुगूंज पाई जाती है । जैसे कुँवर नारायण के उन्मुक्त भोग की
निक ष्ट अभिव्यक्ति को देखा जा सकता है।।
अस्तित्ववाद का
विकास-
अस्तित्त्ववाद
की भूमिका नीत्से एवं किर्कगार्ड ने उन्नीसवीं सदी में ही तैयार कर दी थी । यद्यपि
उन्होंने कोई दर्शन प्रतिपादित नहीं किया, फिर भी उनके विचार
अस्तित्त्ववादी द ष्टिकोण को प्रेषित करते हैं और इसी कारण वह आधुनिक युग के
अस्तित्त्ववाद के प्रवर्तक बन गए । उनका कहना था कि ईश्वर को परोक्ष साधनों से
अथवा प्रक ति में नहीं खोजा जा सकता । धर्म आन्तरिक विकल्प होता है जिसमें श्रद्धा
की भी आवश्यकता होती है । कला , विज्ञान एवं इतिहास उसके
पूरक हैं , उसके अंग हैं । जीवन मानव के निश्चय पर निर्भर
करता है । मानव औत्सुक्य की स्थिति में रहता है और निराशा के मार्ग से गुजरता है ।
इन्हीं विचारों को आधार मानकर जर्मन में अस्तित्त्ववादी विचारधारा का सूत्रपात हुआ
।
स्वयं
अस्तित्त्व ' ( Existence ) शब्द का भी किर्कगार्ड ने ही
सर्वप्रथम प्रयोग किया था । बीसवीं सदी के प्रारम्भ में जर्मनी के ही मार्टिन
हेडेगर ने अस्तित्त्ववादी विचारधारा को आगे बढ़ाया । उनके दर्शन की मुख्य समस्या
मानव के होने की है । यह अस्तित्त्व म त्यु के लिए है । उनके अनुसार , मानव असहिष्णु संसार में अपने उद्देश्यों की पूर्ति के हेतु संघर्ष करता
है , जिसका परिणाम अनिवार्यतः ' न कुछ
तक पहुँचते - पहुँचते म त्यु तक पहुँच जाता है । कार्ल जेस्पर्स भी हेजेगर का
समकालीन था । उसने भी इस विचारधारा को बल दिया ।
जेस्पर्स के
अनुसार विज्ञान और दर्शन दोनों ही सत्य की खोज में असफल है । कोई भी व्यक्ति
एकांतिक नहीं है । अस्तित्त्व का भी विस्तार होता है । समस्त अध्यात्मक दार्शनिक
के लिए एक ' अस्तित्त्ववान ' की
खोज है । जेस्पर्स की द ष्टि में भी निराशा एवं खीझ का प्रतिपादन तथा मत्यु का
अनिवार्य भय है जो अस्तित्व की चरम त प्ति है ।
फ्रांसीसी
साहित्यकार ज्यों पाल सात्र अस्तित्त्ववादी विचारकों में सर्वोपरि माने जाते हैं ।
वे नास्तिक अस्तित्त्ववाद के प्रतिपादक हैं । उनका मत है कि ईश्वर मर चुका है । ( God is dead )
, वस्तुतः अस्तित्त्ववाद ' नास्ति ' की स्थिति में निकाले गए परिणामों का प्रयास मात्र है " Existentialism
is nothing but an attempt to draw all the consequences from a consistent
ethostic position . * सात्र ने ' ईश्वर है '
के विचार को नकारा है तथा अस्तित्त्व ' को सार
से भी पूर्व की स्थिति माना है । उनके मतानुसार चेतन विषय अपने लिए । ( For
itself ) होता है और वस्तु जगत् ( Object ) स्वयं
में होता है। मानव जीवन इन दोनों स्थितियों को एक सूत्र में जोड़ने का संघर्ष काल
है जिसका पूर्व नियोजित परिणाम असफलता होता है । मानव कुछ करने के लिए स्वतन्त्र
है । समाज उसकी द ष्टि में विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं है । मानव मत्यु के भय से
ग्रस्त रहता है । अन्य विचारक अल्बर्ट कामू के विचार भी सार्च जैसे ही हैं । वह भी
मृत्यु , विसंगत स्थितियों , वैयक्तिकता
, संघर्ष आदि की ही बात करता अस्तित्ववाद के अन्य उन्नायकों
और पोषकों में मार्शल , रिल्के , पोलटेलिश
आदि हैं । इनके विचार से वे अनुभव जिन्हें हम चुनते हैं , महत्त्वपूर्ण
हैं । इसका कारण अस्तित्त्ववाद की ' चुनाव ' की प्रकृति है , क्योंकि वे ही अनुभव व्यक्ति की
विशेषता को प्रेषित करते हैं । ये अनुभव ही हमारी प्रकृति को दर्शाते हैं । वे ही
क्षण होते हैं जिनमें हमारा अस्तित्त्व होता है । आत्मनिष्ठा पर बल देने के कारण
अस्तित्त्ववाद एक ऐसा मुक्त दर्शन है जिनमें सामाजिक सौहार्द में विश्वास का
प्रकटीकरण नहीं है और मानवीय पूर्णता के प्रति आशा भी नहीं है ।
निष्कर्ष-
अस्तित्त्ववाद आधुनिक युग की सबसे बड़ी विशेषता और माँग व्यक्तिगत मानवीय
स्वतन्त्रता पर विशेष बल देता है । वह वर्ग समुदाय की सारहीनता को सिद्ध करता है
और नए यथार्थ बोध के आधार पर नवीन मूल्य बोध के स जन द्वारा जीवन और जगत् में
क्रान्ति लाते रहने का हामी है जिससे कोई मूल्य बोध जड़ न हो जाए । अस्तित्ववाद की
ये विशेषताएँ ही उसकी सीमाएँ बन गई है । व्यक्तिगत मानवीय स्वतन्त्रता का पक्षपाती
अस्तित्ववादी मानव कर्मठ के स्थान पर विवश अधिक दिखाई देती है । उसकी मूल्यभावना पलायनवाद
की ही प्रव त्ति अधिक दर्शाती है । व्यक्तिगत मानवीय स्वतन्त्रता की अति के कारण
ही अस्तित्त्ववादी रचनाओं में जीवन की व्यर्थता , नैतिक अवमूल्यन , निराशा , पलायन
, भयंकर यान व त्ति विश्लेषण आदि के भाव द ष्टिगोचर होते हैं
।
अस्तित्ववाद
परम्परागत मानों एवं पूर्व बोधों को नकारता है जिसके बिना किसी नए मूल्य का
निर्माण सम्भव नहीं है । इसके अभाव में न तो क्रान्ति आ सकती है और न कलाकार
क्रान्तिद ष्टा बन सकता है ।
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